Hindi Kavita
हिंदी कविता
"सफ़र" - सुव्रत शुक्ल
जाने क्यों जिन्दगी अपनी लगती अजीब थी,
मंजिल भी बन चुकी कुछ पल, बदनसीब थी।
जीवन की खूबसूरती ,खातिर सफर किया,
खोयी कहीं मिली, दिल के जो करीब थी।
जाना हूं खुद को भूल कर, जिंदगी को मैं,
उलझी हुई , पड़ी है यहां वो जरीब सी।
मेरे सफ़र में आए - गए लाखों मोड़, पर
मंजिल मेरी न जाने क्यों, गुमनाम ही रही।
अब तो शुरू किया है सफ़र, फिर नया कोई,
अब ये नसीब है मेरा, तब वो नसीब थी।
- सुव्रत शुक्ल
Tags
