ये मेरी ग़ज़लें ये मेरी नज़्में / फ़राज़ - अहमद फ़राज़ Yeh Meri Ghazal - Ahmad Faraz

Hindi Kavita

Hindi Kavita
हिंदी कविता

ये मेरी ग़ज़लें ये मेरी नज़्में / फ़राज़ - अहमद फ़राज़
Yeh Meri Ghazal - Ahmad Faraz


ये मेरी ग़ज़लें ये मेरी नज़्में तमाम तेरी हिकायतें हैं
ये तज़्किरें तेरी लुत्फ़ के हैं ये शेर तेरी शिकायतें हैं
मैं सब तेरी नज़्र कर रहा हूँ ये उन ज़मानों की स'अतें हैं
जो ज़िन्दगी के नये सफ़र में तुझे किसी रोज़ याद आयें
तो एक एक हर्फ़ जी उठेगा पहन के अन्फ़ास की क़बायें
उदास तनहाईयों के लम्हों में नाच उठेंगी ये अप्सरायें

मुझे तेरी दर्द के अलावा भी और दुख थे, ये जानता हूँ
हज़ार ग़म थे जो ज़िन्दगी की तलाश में थे, ये जानता हूँ
मुझे ख़बर है कि तेरी आँचल में दर्द की रेत छानता हूँ
मगर हर एक बार तुझ को छू कर ये रेत रंग-ए-हिना बनी है
ये ज़ख़्म गुलज़ार बन गये हैं ये आहें-सोज़ाँ घटा बनी है
ये दर्द मौज-ए-सबा हुआ है ये आग दिल की सदा बनी है
Ahmed-Faraz
और अब ये सारी मता-ए-हस्ती ये फूल ये ज़ख़्म सब तेरे हैं
ये दुख के नौहे ये सुख के नग़्में जो कल मेरे थे वो अब तेरे हैं
जो तेरी क़ुर्बत तेरी जुदाई में कट गये रोज़-ओ-शब तेरे हैं
वो तेरा शायर तेरा मुग़न्नी वो जिस की बातें अजीब सी थी
वो जिस के अन्दाज़ ख़ुस्रो-वाना थे और अदायेँ ग़रीब सी थीं
वो जिस के जीने की ख़्वाहिशें भी ख़ुद उस के अपने नसीब सी थीं

न पूछ उस का कि वो दीवाना बहुत दिनों का उजड़ चुका है
वो कोहकन तो नहीं था लेकिन कड़ी चट्टानों से लड़ चुका है
वो थक चुका है और उस का तेशा उसी के सीने में गड़ चुका है

#buttons=(Ok, Go it!) #days=(20)

Our website uses cookies to enhance your experience. Check Now
Ok, Go it!